
- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना स्टेट डेस्क। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर लगातार सुर्खियों में हैं। जन सुराज यात्रा और उनके दावों ने बड़ा विमर्श खड़ा कर दिया है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह आंदोलन असल में सवर्ण समाज की बेचैनी की उपज है। वास्तव में, यह जातीय कुंठा से भरी उत्तेजना है।
मंडल बनाम सवर्ण की पृष्ठभूमि:
पिछले 35 सालों से बिहार मंडल राजनीति के दबदबे में है। इसी से हाशिए पर गए सवर्ण समाज, खास कर ब्राह्मण वर्ग में नाराज़गी है। जन सुराज उसी बेचैनी का मंच माना जा रहा है। प्रशांत इसी से उबरने का एक सुसज्जित विंडो पेश कर रहे हैं। लेकिन प्रशांत किशोर की यह जो सबसे अच्छी चीज है, वहीँ पर वह बुरी तरह एक्सपोज हो जाते हैं। संयोग नहीं कि प्रशांत किशोर का सबसे बड़ा निशाना लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे मंडल नेता हैं। इस बार सम्राट चौधरी और अशोक चौधरी बुरी तरह निशाने पर हैं। पर मंगल पांडेय, दिलीप जायसवाल और संजय जायसवाल के प्रति इनका बदलता रुख इनकी कलई खोल रहा है।
विरोधाभासी विचारधारा:
प्रशांत खुद को गांधीवादी और कभी सेंटर-लेफ्ट बताते हैं। लेकिन उनके विचारों में निरंतर विरोधाभास दिखता है। राहुल गाँधी जैसे सुलझे राजनीतिज्ञ भी प्रशांत किशोर के प्रति चुप्पी साध लेते हैं। मीडिया के तमाम धांसू सवर्ण टीकाकार साफ तौर पर सॉफ्ट नजर आते हैं। भूमि सुधार से लेकर शिक्षा, रोजगार और जल प्रबंधन तक हर विषय पर वे खुद को नए विचारक की तरह पेश करते हैं। जबकि ये मुद्दे दशकों से बहस का हिस्सा रहे हैं।
बौद्धिक अहंकार और आंकड़ों का खेल:
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत किशोर भाषा और आंकड़ों के खेल में माहिर हैं। पर उनमें कोई स्थायी वैचारिक दृष्टि नहीं दिखती। उनका तेवर क्रांतिकारी दिखता है, लेकिन वह गहराई से खाली है। इनमें विचारधारा के प्रति कोई सुसंबद्धता या प्रतिबद्धता नहीं है। प्रशांत का बगावती तेवर क्रांति या आंदोलन के विचार को खारिज करता है। कुल मिलाकर वह एक ठेठ सवर्ण बौद्धिक का अहंकार हैं।
पद यात्रा का असर और सीमाएँ:
प्रशांत किशोर की पद यात्रा ऐतिहासिक मानी जा रही है। तीन साल में पाँच हजार किलोमीटर और पचपन सौ गांवों तक पहुँचना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन जानकार मानते हैं कि महज़ मीडिया मैनेजमेंट और किराए के कार्यकर्ताओं से बदलाव संभव नहीं। राजनीतिक क्रांतियाँ विचारधारा और लम्बे संघर्ष से ही खड़ी होती हैं।
भ्रम या हकीकत?:
समकालीन परिघटना का विश्लेषण हमेशा जोखिम भरा होता है। जन सुराज को डिकोड करना वाकई चुनौतीपूर्ण है। यह बिहार के विभिन्न सामाजिक समूहों को मिक्स्ड सिग्नल देता है। कई लोगों को जनसुराज नई सुबह की आहट लगती है। लेकिन आलोचकों का दावा है कि यह असल में एक स्क्रिप्टेड रियलिटी शो है। प्रशांत किशोर के पीछे खड़ा असली सूत्रधार अब छिपा नहीं रह गया है। प्रशांत किशोर उसी छत्रछाया का लाभ ले रहे हैं।
