-डॉ अरुण कुमार मयंक-
नई दिल्ली/पटना डेस्क। 23 दिन… सिर्फ पानी के सहारे… मौत सामने खड़ी थी, डॉक्टर मल्टीपल ऑर्गन फेल होने की चेतावनी दे रहे थे, लेकिन यह लड़की टस से मस नहीं हुई। जंतर-मंतर पर जब सोनम वांगचुक को पुलिस अस्पताल ले गई, तब भी एक 25 साल की पीएचडी स्कॉलर अपने दो साथियों के साथ अनशन पर डटी रही। आखिर कौन हैं नेहा बोरा, जिनकी चर्चा अब देशभर में हो रही है? क्यों सोशल मीडिया उन्हें छात्र आंदोलन की नई आवाज बता रहा है? कैसे एक साधारण परिवार की बेटी JNU से निकलकर राष्ट्रीय बहस का चेहरा बन गई? और आखिर क्यों मीडिया की सुर्खियां उनसे दूर रहीं? पढ़िए नेहा बोरा की पूरी कहानी, जिसने शिक्षा व्यवस्था, NEET पेपर लीक और छात्रों के भविष्य की लड़ाई को नया चेहरा दे दिया।
23 दिन मौत से मुकाबला, लेकिन नहीं टूटा हौसला:
NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन उस वक्त ऐतिहासिक बन गया, जब JNU की पीएचडी स्कॉलर और AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने आमरण अनशन शुरू किया। पूरे 23 दिनों तक उन्होंने केवल पानी के सहारे खुद को जिंदा रखा। डॉक्टर लगातार चेतावनी देते रहे कि शरीर के कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं, लेकिन नेहा अपने फैसले पर अडिग रहीं। जब आंदोलन के दौरान सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस अस्पताल ले गई, तब भी नेहा बोरा, मनीष कुमार और आमीन अमितोज अनशन पर डटे रहे। इसी वजह से छात्र आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज के रूप में उनकी पहचान बनी।
सोनम वांगचुक छाए रहे, लेकिन नेहा क्यों रहीं सुर्खियों से दूर?
जंतर-मंतर पर एक तरफ सोनम वांगचुक की हर गतिविधि राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रही, वहीं दूसरी ओर उसी मैदान में 23 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाली नेहा बोरा को अपेक्षाकृत बहुत कम कवरेज मिली। इस पर कई तरह की चर्चाएं हुईं। एक वजह उनका AISA से जुड़ाव बताया गया, जबकि दूसरी वजह यह रही कि मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा फोकस सोनम वांगचुक पर केंद्रित रहा। हालांकि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में युवाओं ने सवाल उठाया कि NEET जैसे बड़े मुद्दे पर जान जोखिम में डालने वाली छात्र नेता को बराबर जगह क्यों नहीं मिली।
क्या सोनम वांगचुक और नेहा बोरा के बीच मतभेद थे?
आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर यह भी चर्चा रही कि दोनों के मंच अलग-अलग क्यों थे। नेहा बोरा ने खुद इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि लड़ाई एक ही मुद्दे की है और लक्ष्य भी एक ही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए मंच नहीं, बल्कि छात्रों का भविष्य सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सोनम वांगचुक के संघर्ष की सराहना की और कहा कि उनका अनशन युवाओं के लिए प्रेरणा है।
अभिजीत दीपके ने भी की नेहा की तारीफ:
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अभियान से जुड़े अभिजीत दीपके ने भी मंच से नेहा बोरा की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद भी आंदोलन कमजोर नहीं पड़ा क्योंकि नेहा बोरा जैसी छात्र नेता मोर्चे पर डटी रहीं। बताया जाता है कि सोनम वांगचुक ने भी अस्पताल जाने से पहले उन छात्र नेताओं के जज्बे की तारीफ की, जिन्होंने लंबे समय तक आंदोलन को जारी रखा।
कौन हैं नेहा बोरा?
नेहा बोरा मूल रूप से असम से जुड़ी हैं। उनका बचपन सिलीगुड़ी में बीता, जहां उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) से शुरुआती पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक किया, फिर आंबेडकर विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हासिल की और बाद में JNU में समाजशास्त्र विषय में पीएचडी रिसर्च शुरू की। छात्र राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहते हुए वह AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं और शिक्षा, फीस वृद्धि, सामाजिक न्याय तथा छात्र अधिकारों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहीं।
शिक्षा सुधार को सामाजिक न्याय का सवाल मानती हैं नेहा:
नेहा बोरा का मानना है कि समाजशास्त्र केवल किताबों में पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि समाज बदलने का माध्यम है। उनका कहना है कि शिक्षा का निजीकरण, पेपर लीक और भर्ती घोटाले केवल प्रशासनिक विफलताएं नहीं, बल्कि गरीब और वंचित छात्रों के भविष्य पर सीधा हमला हैं। इसी सोच के कारण उन्होंने NEET पेपर लीक को लेकर देशव्यापी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
नेहा के साथ कौन थे ये दो छात्र?
इस आंदोलन में नेहा बोरा के साथ दो अन्य छात्र नेता भी लगातार डटे रहे। आमीन अमितोज, डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय में अर्बन स्टडीज के पीएचडी शोधार्थी हैं और किसान आंदोलन में भी सक्रिय रहे हैं। वहीं मनीष कुमार AISA के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के शोधार्थी हैं। तीनों ने मिलकर लंबे समय तक आमरण अनशन जारी रखा।
शबाना आजमी की अपील पर टूटा अनशन:
23 दिनों के बाद जब अभिनेत्री शबाना आजमी जंतर-मंतर पहुंचीं तो उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा कि देश को इस लड़ाई के लिए नेहा का जिंदा रहना ज्यादा जरूरी है। बताया जाता है कि उनके समझाने और परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए नेहा बोरा, मनीष कुमार और आमीन अमितोज ने पानी पीकर अपना अनशन समाप्त किया।
अब क्यों चर्चा में हैं नेहा बोरा?
23 दिनों की भूख हड़ताल, NEET पेपर लीक के खिलाफ संघर्ष, छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका और शिक्षा सुधार की मांग ने नेहा बोरा को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित चेहरा बना दिया है। समर्थक उन्हें छात्र आंदोलन की नई आवाज बता रहे हैं, जबकि आलोचक उनकी राजनीति पर सवाल उठाते हैं। लेकिन इतना तय है कि जंतर-मंतर के इस आंदोलन ने नेहा बोरा को राष्ट्रीय बहस का एक प्रमुख चेहरा बना दिया है।
