- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना ब्यूरो। एमएलसी चुनाव से पहले जेडीयू के अंदर मचा सियासी घमासान अब बंद कमरे की सुलह तक पहुंच गया है। अनंत सिंह के नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर उतरने और पटना स्नातक सीट पर अनुज कुमार को समर्थन देने के बयान ने पार्टी की चुनावी रणनीति की मुश्किलें बढ़ा दीं। अब पार्टी ने मोर्चा संभाल लिया है—बैठक हुई, एकजुटता का संदेश दिया गया और अनंत-नीरज के बीच बढ़ती तल्खी को खत्म करने की जिम्मेदारी उमेश कुशवाहा और श्रवण कुमार को सौंप दी गई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दोनों नेताओं में सुलह होगी या नहीं—बड़ा सवाल यह है कि एमएलसी चुनाव से पहले जेडीयू के भीतर चल रही इस सियासी खींचतान का असर एनडीए के चुनावी समीकरण पर कितना पड़ेगा?
सियासी विश्लेषण: मामला सिर्फ दो नेताओं की नाराजगी का नहीं!
पटना में हुई जेडीयू की बैठक को महज एक सामान्य संगठनात्मक बैठक मानना राजनीतिक तौर पर बड़ी भूल होगी। जिस समय विधान परिषद चुनाव सिर पर है और पटना स्नातक सीट पर अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं, उसी समय पार्टी का सभी प्रमुख नेताओं को एक मंच पर लाना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश है।
अनंत सिंह का यह कहना कि जो उनका समर्थन नहीं करता, उसे वह समर्थन क्यों दें—साफ संकेत था कि मामला व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों तक पहुंच चुका है। वहीं नीरज कुमार पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। ऐसे में अनंत सिंह का दूसरे उम्मीदवार के समर्थन की बात कहना जेडीयू के लिए सिर्फ एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि वोट मैनेजमेंट और संगठनात्मक एकजुटता की चुनौती बन सकता है।
यही वजह है कि पार्टी अब सार्वजनिक टकराव को चुनावी नुकसान में बदलने से पहले डैमेज कंट्रोल के रास्ते पर दिखाई दे रही है।
श्रवण-उमेश की एंट्री क्यों अहम?
प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और मंत्री श्रवण कुमार को सुलह की जिम्मेदारी देना बताता है कि पार्टी इस विवाद को हल्के में नहीं लेना चाहती। राजनीति में कई बार चुनावी लड़ाई उम्मीदवारों के बीच होती है, लेकिन जब पार्टी के भीतर के प्रभावशाली नेता अलग-अलग खेमों में दिखाई देने लगें तो उसका सीधा असर कार्यकर्ताओं और जमीनी वोट मैनेजमेंट पर पड़ सकता है।
यही वह मोर्चा है जहां जेडीयू सबसे ज्यादा सतर्क दिख रही है।
बैठक में एकजुटता का प्रस्ताव रखा गया और किसी बड़े विरोध की बात सामने नहीं आई। यह पार्टी के लिए फिलहाल राहत की खबर जरूर है, लेकिन असल परीक्षा बैठक खत्म होने के बाद शुरू होती है।
अनंत सिंह की खामोशी भी बहुत कुछ कहती है!
बैठक से बाहर निकलते वक्त अनंत सिंह का मीडिया से दूरी बनाना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने सवालों का जवाब नहीं दिया और सीधे गाड़ी में बैठकर निकल गए। इसे सीधे तौर पर नाराजगी का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि अनंत सिंह के पुराने बयान और बैठक के बाद उनकी चुप्पी ने सियासी अटकलों को हवा दे दी है। दूसरी तरफ नीरज कुमार का यह कहना कि अगर अनंत सिंह नाराज होते तो बैठक में क्यों आते—पार्टी के भीतर मतभेद को सामान्य बताने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या जेडीयू का ‘डैमेज कंट्रोल’ सफल होगा?
एमएलसी चुनाव में पार्टी के लिए सबसे जरूरी चीज उम्मीदवार की व्यक्तिगत ताकत से ज्यादा संगठन का वोट ट्रांसफर है। अगर स्थानीय स्तर पर नेता और कार्यकर्ता अलग-अलग दिशा में चले गए तो पार्टी का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि जेडीयू फिलहाल सार्वजनिक बयानबाजी को खत्म कर एकजुटता की तस्वीर पेश करना चाहती है। लेकिन राजनीतिक जमीन पर असली सवाल अब भी कायम है—क्या अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच वास्तव में दिल मिले हैं, या सिर्फ चुनाव तक मतभेदों पर पर्दा डाला गया है?
निष्कर्ष: असली फैसला बैठक में नहीं, बूथ पर होगा!
जेडीयू की बैठक से फिलहाल यही संदेश निकला है कि पार्टी खुली लड़ाई को चुनावी नुकसान में बदलने के मूड में नहीं है। नेतृत्व ने एकजुटता का संदेश दिया है और सुलह के लिए अपने भरोसेमंद नेताओं को मैदान में उतार दिया है। लेकिन राजनीति में मंच पर साथ बैठना और जमीन पर साथ वोट दिलाना—दो अलग चीजें हैं।
अगर श्रवण कुमार और उमेश कुशवाहा अनंत सिंह की नाराजगी को पूरी तरह खत्म कराने में सफल होते हैं, तो जेडीयू पटना स्नातक सीट समेत विधान परिषद चुनाव में अपने समीकरण मजबूत कर सकती है। लेकिन अगर अंदर की खटास कायम रही और उसका असर कार्यकर्ताओं तक पहुंचा, तो यह विवाद एक सीट की लड़ाई से बढ़कर जेडीयू की अंदरूनी एकजुटता की परीक्षा बन सकता है।
फिलहाल जेडीयू ने आग पर पानी डाल दिया है—अब देखना यह है कि चिंगारी पूरी तरह बुझती है या चुनावी मौसम में फिर भड़क उठती है।
