

- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना डेस्क। जिस शख्स के पास अपने लिए सब कुछ जुटाने के मौके थे, उसने अपने गांव के सर्वांगीण विकास के लिए मार्ग चुने। सुप्रीम कोर्ट के विधिवेत्ता गोपाल सिंह ने पैरवी सिर्फ न्यायालय में नहीं की—उन्होंने अपने गांव मुरगावां के विकास की भी पैरवी की। नतीजा यह कि कभी सामान्य ग्रामीण बस्ती रहा मुरगावां आज सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, हरियाली, स्वच्छता, धार्मिक स्थलों और आधुनिक सुविधाओं से लैस बिहार में एक विकसित गांव की तस्वीर पेश कर रहा है।
यह कहानी सिर्फ सरकारी योजनाओं की नहीं है। यह कहानी है एक व्यक्ति की दूरदृष्टि, गांव वालों के सामूहिक श्रम, प्रशासनिक समन्वय, संस्थागत सहयोग और सामाजिक भागीदारी की।1992 में शुरू हुई पहल से लेकर आज के आधुनिक मुरगावां तक—गोपाल सिंह की सोच ने कैसे एक गांव के विकास की दिशा बदल दी? कैसे व्यक्तिगत अवसरों को उन्होंने ग्रामीण युवाओं और गांव के हित में मोड़ा? और कैसे कोविड के बाद सामाजिक एकजुटता ने इस विकास यात्रा को नई रफ्तार दे दी?
मुरगावां की कहानी बताती है कि अगर सोच बड़ी हो, इरादा मजबूत हो और समाज साथ खड़ा हो जाए, तो गांव सिर्फ विकसित नहीं होता—वह एक मॉडल बन सकता है।
विकास की असली पटकथा: जब निजी लाभ से ऊपर रखा गांव
गोपाल सिंह की मुरगावां के विकास की कहानी किसी एक परियोजना या एक सरकारी योजना से शुरू नहीं होती। इसकी बुनियाद उस सोच में दिखाई देती है, जिसमें व्यक्तिगत उपलब्धि को सामाजिक उपयोग से जोड़ने का प्रयास किया गया। 1992 में तत्कालीन रेल मंत्री सी. के. जाफ़र शरीफ़ के विधिक सलाहकार बनने के बाद गोपाल सिंह ने अपने लिए आर्थिक लाभ मांगने के बजाय गांव के युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने का आग्रह किया। बताया जाता है कि इसका लाभ मुरगावां के करीब 15 परिवारों को मिला।
इसके बाद 1997-98 में तत्कालीन रक्षा मंत्री और नालंदा से सांसद के वकील के रूप में काम करने के दौरान भी उन्होंने गांव को प्राथमिकता दी। इसी दौर में HUDCO की योजना के तहत मुरगावां को आदर्श गांव के रूप में विकसित करने का अवसर मिला। 2005 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार राज्य के सुप्रीम कोर्ट में स्थायी वकील (Standing Counsel) नियुक्त किए जाने के बाद भी गांव के विकास का मुद्दा उनकी प्राथमिकताओं में बना रहा। यानी मुरगावां की विकास गाथा का मूल संदेश साफ है—पद मिला तो पद का उपयोग, संपर्क मिला तो संपर्क का उपयोग और अवसर मिला तो उसे गांव के विकास में लगाने की कोशिश।
सड़क से स्कूल तक—विकास ने बदली तस्वीर
मुरगावां के विकास में बुनियादी ढांचे को सबसे मजबूत आधार बनाया गया। बड़ी मठ से रामगंज तक मुरगावां होकर करीब 15 किलोमीटर सड़क, विक्रमपुर बाईपास, जीरवा खंधा से कोइरी टोला तक सड़क, लोहरवा बीघा पुल, पैन-अपासी खताई, पुलियों और स्लुइस गेट जैसे निर्माण कार्यों ने आवागमन और ग्रामीण संपर्क को मजबूती दी। इसके साथ ही मध्य विद्यालय, हाई स्कूल और +2 स्कूल भवन तथा अस्पताल भवन जैसी सुविधाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को नया आधार दिया। गांव के भीतर PCC सड़कें, नालियाँ और स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाओं ने रोजमर्रा की जिंदगी को भी बेहतर बनाने में भूमिका निभाई।
पानी की समस्या पर सीधा प्रहार:
ग्रामीण विकास में सबसे अहम मुद्दों में से एक है—पीने का साफ पानी।
मुरगावां में करीब 550 फीट गहरे सबमर्सिबल बोरवेल, ओवरहेड पानी की टंकी और घर-घर पेयजल पहुंचाने की व्यवस्था ने इस जरूरत को संशोधित किया। एक अन्य बोरवेल से तालाब और ब्रह्मस्थान तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी की गई। यानी विकास सिर्फ सड़क और इमारतों तक सीमित नहीं रहा—जल जैसी बुनियादी जरूरत को भी केंद्र में रखा गया।
शौचालय, आवास और हरियाली—समावेशी विकास की कोशिश
हर घर में शौचालय, इंदिरा आवास योजना के तहत आवास निर्माण में सहायता और राज्य सरकार की योजना के तहत मछुआरा समुदाय के लिए आवास सहायता जैसी पहलें विकास को सामाजिक आधार देती हैं। और फिर आया हरियाली का अभियान। गांव और आसपास के इलाकों में करीब 15 हजार पेड़ लगाए गए, जिनमें लगभग 8,500 पेड़ों के सुरक्षित और फलने-फूलने का दावा किया गया है। यह आंकड़ा बताता है कि मुरगावां के विकास की सोच में सिर्फ कंक्रीट नहीं, बल्कि पर्यावरण भी शामिल रहा।
कोविड के बाद जागा सामूहिक संकल्प:
कोविड महामारी के कठिन दौर ने मुरगावां में एक नई सामाजिक पहल को जन्म दिया। 2 दिसंबर 2022 को ‘बंदी परमेश्वरी जी चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना पाँच ट्रस्टियों के साथ हुई। अध्यक्ष राम नरेश सिंह, सचिव बिनोद नारायण सिंह, कोषाध्यक्ष रामानुज राम तथा सदस्य राजीव कुमार ‘मुन्ना’ और शिव शंकर सिंह ने ट्रस्ट के माध्यम से सामाजिक विकास को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में काम शुरू किया। सेटलर गोपाल सिंह के मार्गदर्शन, अध्यक्ष राम नरेश सिंह के नेतृत्व और सचिव बिनोद नारायण सिंह के जमीनी प्रयासों के साथ ट्रस्ट ने विकास के अगले चरण को आगे बढ़ाया।
दान और सहयोग से बन रहा आधुनिक मुरगावां:
जस्टिस एस.सी. अग्रवाल चैरिटेबल ट्रस्ट से मिली आर्थिक सहायता ने आधुनिक ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर को गति दी। न्यूयॉर्क में ऑर्थोपेडिक सर्जन रहे स्व. डॉ. अजय कुमार सिन्हा ने अपनी पत्नी, न्यूयॉर्क की ऑन्कोलॉजिस्ट और मुरगावां की बेटी स्व. डॉ. मधु सिन्हा की स्मृति में कैफ़े के निर्माण के लिए योगदान दिया। बी.पी. सिंह शकुंतला फाउंडेशन ने ओपन जिम के उपकरण उपलब्ध कराए। वहीं अन्य लोगों ने बच्चों के लिए खिलौने, किताबें, स्टेशनरी और खेल सामग्री देकर इस सामूहिक अभियान में भागीदारी की। यहां विकास का एक अलग मॉडल दिखाई देता है—सरकार बुनियादी ढांचा दे, संस्थाएं सहयोग करें और समाज अपनी जिम्मेदारी निभाए।
तालाब बना मुरगावां की नई पहचान:
मुरगावां का तालाब अब केवल पानी का स्रोत या धार्मिक स्थल नहीं रहा। साफ-सफाई, चौड़ी सीढ़ियां और पूजा घाट के साथ इसे आकर्षक स्वरूप दिया गया है। तालाब में 16 रंगों वाला करीब 25-30 फीट ऊंचा कमल की पंखुड़ियों जैसा फव्वारा लगाया गया है। एक तरफ 30 KVA क्षमता का सोलर पैनल भी लगाया गया है। अब यही तालाब छठ पूजा, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक कार्यक्रमों का प्रमुख केंद्र बन रहा है। यानी परंपरा और आधुनिकता को एक ही जगह जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
मंदिर से ब्रह्मस्थान तक—आस्था का भी कायाकल्प
गांव वालों ने आपसी सहयोग, स्वैच्छिक श्रम और आर्थिक योगदान से शिव मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर में संगमरमर और विट्रिफ़ाइड टाइल्स, नई चारदीवारी और लोहे की रेलिंग लगाई गई। दो टाइल्स वाले पानी के फव्वारे, कमल-तालाब और विदेशी पौधों से सुसज्जित बगीचा भी तैयार किया गया। मंदिर से जुड़े ब्रह्मस्थान का भी पुनर्विकास किया गया और वहां तक PCC रास्ता बनाया गया। यह विकास की उस सोच को दर्शाता है जिसमें ग्रामीण बुनियादी ढांचे के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को भी महत्व दिया गया।
अब अगली मंज़िल—शिक्षा और पर्यटन
मुरगावां की विकास यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। गांव में लोगों के मनोरंजन के लिए पैडल बोट और ई-बग्गी लाने की कोशिशें जारी हैं। वहीं मुरगावां को सिर्फ शिक्षा के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना भी आगे बढ़ रही है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक सुंदर पार्क विकसित करने की परिकल्पना की जा रही है। अगर ये योजनाएं जमीन पर पूरी तरह उतरती हैं, तो मुरगावां ग्रामीण विकास, शिक्षा, संस्कृति और पर्यटन को एक साथ जोड़ने वाला उदाहरण बन सकता है।
विकास विश्लेषण: मुरगावां मॉडल की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
मुरगावां की कहानी को सिर्फ “एक गांव में विकास कार्य” कह देना इसके व्यापक पहलू को छोटा कर देना होगा। इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत है—कनेक्टिविटी + शिक्षा + स्वास्थ्य + पानी + स्वच्छता + पर्यावरण + संस्कृति + सामुदायिक भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश।
दूसरी बड़ी बात है व्यक्तिगत प्रभाव को सार्वजनिक हित से जोड़ना।
गोपाल सिंह की भूमिका इस कहानी में इसलिए महत्वपूर्ण दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अपने पेशेवर जीवन से बने संपर्कों और अवसरों को गांव की जरूरतों से जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन इस पूरी यात्रा को केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि मानना भी अधूरा होगा। किसी गांव का स्थायी विकास तब होता है, जब नेतृत्व के साथ स्थानीय लोग, प्रशासन, सरकारी योजनाएं, सामाजिक संस्थाएं और दानदाता—सभी एक दिशा में काम करें। मुरगावां में यही सामूहिकता इसकी सबसे बड़ी पूंजी बनकर उभरती है।
निष्कर्ष: एक व्यक्ति की सोच, पूरे गांव की तस्वीर
मुरगावां की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि गांव का विकास सिर्फ बजट से नहीं होता—दृष्टि, नेतृत्व और भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। गोपाल सिंह ने अपने पेशेवर जीवन में मिले अवसरों को गांव की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश की। गांव के लोगों ने श्रम और आर्थिक सहयोग दिया। सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक तंत्र से बुनियादी परियोजनाओं को गति मिली। ट्रस्ट और सामाजिक संस्थाओं ने विकास को नया संस्थागत आधार दिया। प्रवासी और स्थानीय लोगों ने भी अपनी क्षमता के अनुसार योगदान किया। आज सड़क से पानी तक, स्कूल से अस्पताल तक, तालाब से मंदिर तक और हरियाली से आधुनिक सुविधाओं तक—मुरगावां एक लंबे सामूहिक प्रयास की तस्वीर पेश करता है।
और शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है—अगर नेतृत्व गांव से जुड़ा हो, सोच निजी स्वार्थ से ऊपर उठे और पूरा समाज साथ खड़ा हो जाए, तो एक गांव की तस्वीर ही नहीं बदलती—उसकी पहचान बदल जाती है। मुरगावां अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि यह सवाल है—क्या बिहार के दूसरे गांव भी इसी तरह अपनी विकास-कहानी खुद लिख सकते हैं?
