
- पंचमुखी न्यूज –
बिहारशरीफ डेस्क। नालंदा में कांग्रेस का बहुचर्चित ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ सवालों के घेरे में आ गया है। अभियान की ज़मीनी हकीकत और दावों के बीच बड़ा फासला साफ दिखा। शनिवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महज़ पांच कार्यकर्ता पहुंचे। रविवार को हालात और भी निराशाजनक रहे। बिहारशरीफ के अनुग्रह नारायण पार्क में गांधी प्रतिमा के समक्ष आयोजित उपवास कार्यक्रम में कांग्रेस के तीनों पूर्व विस प्रत्याशी और कई चर्चित चेहरे गायब रहे। मंच सूना रहा। भीड़ नदारद। संगठन की ताकत पर प्रश्नचिह्न लग गया।
उपवास को संबोधित करते हुए लीगल सेल जिलाध्यक्ष सरफराज मल्लिक ने एनडीए सरकार पर तीखा हमला बोला। कहा— मनरेगा से गांधी का नाम मिटाने की कोशिश देश के मजदूरों के रोजगार पर सीधा हमला है। बेरोज़गारी मिटाने के वादे खोखले साबित हुए हैं। वहीं बिहारशरीफ विधानसभा के युवा कांग्रेस अध्यक्ष ई. टीपू रहमान ने कहा— महात्मा गांधी और भारत एक-दूसरे के पर्याय हैं। गांधी का नाम हटाना कुंठित मानसिकता का परिचायक है। लेकिन राजनीतिक संदेश से ज़्यादा चर्चा रही अनुपस्थिति की।
नालंदा कांग्रेस के तीनों प्रत्याशी- छोटे मुखिया, अरुण बिंद और उमैर खान -कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। पार्टी पहले से दो गुटों में बंटी मानी जा रही थी। अब चर्चाएं तेज़ हैं कि तीसरा गुट भी उभर आया है। उपवास में प्रो (डॉ) बच्चन कुमार पांडेय, फरहत ज़बीं, धनंजय पटेल, रोहित रंजन, रमेश पासवान, किरानी पासवान, इम्तियाज़ आलम, असगर भारती, नवीन कुमार, अनिल चंद्रवंशी, सुरेंद्र पासवान और जिलाध्यक्ष मौजूद रहे। लेकिन पार्टी के बड़े और चर्चित चेहरों की मौजूदगी नगण्य रही।
नतीजा साफ है—
अभियान कमजोर, संगठन बिखरा और संदेश फीका।
नालंदा में कांग्रेस का ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ अब राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, गुटबाज़ी की मिसाल बनता दिख रहा है।
