

- डॉ अरुण कुमार मयंक-
पटना स्टेट ब्यूरो। दर्द जब इंसानियत में बदल जाए, तो इतिहास बनता है। बिहार के बक्सर ज़िले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने समाज को झकझोर दिया है और दिल जीत लिया है। इकलौते बेटे की मौत से टूटे एक हिंदू पिता ने ऐसा फैसला लिया, जो मज़हब से ऊपर, इंसानियत की बुलंदी का ऐलान है। बेटे की याद में उन्होंने अपने गांव के मुस्लिम समाज के लिए कब्रिस्तान की ज़मीन दान कर दी।
सड़क हादसे ने छीना इकलौता बेटा:
18 नवंबर 2025। देहरादून में तेज़ रफ्तार कार ने बाइक सवार शिवम को टक्कर मार दी। मौके पर ही मौत। घर में शादी की तैयारी चल रही थी, और अर्थी उठ गई।
शिवम—बी-टेक, एमबीए।
तीन फैक्ट्रियों का संचालन।
उज्ज्वल भविष्य।
सब कुछ एक झटके में खत्म।
मणिकर्णिका घाट पर उठा सवाल:
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार।
चिता की आग में पिता जनार्दन सिंह के मन में एक सवाल उठा—
“जो इस दुनिया में आया है, उसकी विदाई सम्मान से होनी चाहिए।”
यहीं से जन्म हुआ उस फैसले का, जिसने गांव की तस्वीर बदल दी।
गांव में नहीं था मुस्लिम कब्रिस्तान:
रामपुर पंचायत के डेवी डेहरी गांव में करीब 50 मुस्लिम परिवार।
लेकिन कब्रिस्तान नहीं।
मौत के बाद शव को 5 किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता था।
पहले जो कब्रिस्तान था, वहां स्कूल बन गया।
कागज़ नहीं थे, ज़मीन छिन गई।
बेटे की याद में इंसानियत का तोहफा:
जनार्दन सिंह ने परिवार से बात की।
भाई बृजराज सिंह ने प्रस्ताव रखा—
“बेटे की निशानी के तौर पर कब्रिस्तान के लिए ज़मीन दान कर दी जाए।”
फैसला हुआ।
एक बीघा ज़मीन मुस्लिम समाज को सौंप दी गई।
हिंदू- मुस्लिम की साझा कमेटी:
ब्रह्मभोज के दिन मुस्लिम समाज को बुलाया गया।
राय-मशविरा हुआ।
हिंदू–मुस्लिम दोनों समाज की संयुक्त कमेटी बनी।
चाचा बृजराज सिंह—
ज़मीन पर अभी फसल है।
फसल कटेगी।
आमदनी से कब्रिस्तान का विकास होगा।
“अब इस ज़मीन पर हमारे परिवार का कोई अधिकार नहीं।”
गांव बोला: ‘मसीहा मिल गया’
गांव के अलाउद्दीन कहते हैं—
“अब मौत के बाद बेइज्जती नहीं होगी।
हमारे गांव को अपना कब्रिस्तान मिल गया।
यह एहसान नहीं, इंसानियत है।”

पोते की तस्वीर निहारती दादी:
बरामदे में कुर्सी।
उस पर शिवम की तस्वीर।
आंखों में आंसू।
दादी शारदा देवी कहती हैं-
“मेरा सम्राट चला गया।
अब बस यही चाह है कि गांव मेरे बच्चे को इंसानियत की मिसाल के रूप में याद रखे।”
जब दर्द ने तोड़ी मज़हब की दीवार:
यह कहानी किसी धर्म की नहीं।
यह कहानी मानवता की है।
यह कहानी उस भारत की है,
जहां बेटे की मौत भी समाज के लिए उम्मीद बन जाती है।
एक पिता। एक फैसला।
और इंसानियत की अमर निशानी।

नफरत पर मोहब्बत भारी पड़ रही है । लेखक पत्रकार को बहुत-बहुत धन्यवाद