बिहार विधानसभा चुनाव 2025 होने ही वाला है। चुनाव से पहले एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर आपसी खींचतान जारी है। अभी तक घटक दलों में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला भी तैय नहीं हुआ है। कोई नई बात नहीं हुई, तो अक्टूबर में चुनाव होने की प्रबल संभावना है। सितंबर में सीट शेयरिंग का कोई सॉल्यूशन नहीं निकला, तो एनडीए को बड़ी मुश्किल हो सकती है।

– पंचमुखी स्पेशल –
पटना स्टेट डेस्क। बिहार एनडीए में सीट शेयरिंग का फार्मूला तय नहीं हुआ है। जबकि बिहार विधानसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा है। चर्चा है कि अक्टूबर के पहले सप्ताह में चुनाव आयोग तारीखों की घोषणा कर सकता है। ऐसे में सितंबर ही महत्वपूर्ण महीना है। एनडीए में अगले महीने सर्वदलीय बैठक होगी, जिसमें सीट बंटवारे पर चर्चा और मुहर लग सकती है।
एलजेपीआर की बड़ी मांग से बढ़ी परेशानी: लोजपा रामविलास के नेता और सांसद अरुण भारती ने 43 से 137 सीट पर दावेदारी का बयान देकर दबाव बढ़ा दिया है। लोजपा जिन सीटों की मांग कर रही है। उनमें ज्यादातर सीटें जदयू के पास हैं। इसे लेकर टकराव की आशंका है। हालांकि जदयू नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई विवाद नहीं है और सीटों पर भी सहमति बन जाएगी।
चिराग का दबाव, पर 2020 वाली स्थिति नहीं: राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चिराग पासवान दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। अरुण भारती उनके करीबी और रिश्तेदार हैं। इसलिए उनका बयान अहम माना जा रहा है। लेकिन इस बार हालात 2020 जैसे नहीं हैं, क्योंकि चिराग केंद्र में मंत्री हैं। ज्यादा विवाद होने पर उन्हें भी समझौता करना पड़ेगा।
सर्वदलीय बैठक में तय होगा फार्मूला : एनडीए में सीट बंटवारे पर एक राउंड की बातचीत हो चुकी है। सभी दलों ने अपनी मनपसंद सीटों की लिस्ट बीजेपी को दे दी है। बैठक में यही फाइनल होगा कि कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा। सूत्रों के अनुसार बीजेपी और जदयू 100 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जबकि लोजपा को 20 से 24 सीट मिल सकती हैं। जीतन राम मांझी की पार्टी को 6 से 7 सीट और उपेंद्र कुशवाहा को 5 से 6 सीट मिलने की संभावना है।

”एनडीए में चेहरे पर कोई विवाद नहीं है. नीतीश कुमार के नाम पर सब की सहमति है और एनडीए में सीट बंटवारा भी आसानी से हो जाएगा.”-वशिष्ठ नारायण सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, जदयू.
इन सीटों पर चिराग की नजर : लोजपा रामविलास ने ब्रह्मपुर, अतरि, ओबरा, सिमरी बख्तियारपुर, लालगंज, तारापुर, कुशेश्वरस्थान, गोविंदगंज और राघोपुर जैसी सीटों पर दावेदारी जताई है। इनमें से कई सीटें जदयू के पास रही हैं। राघोपुर से तेजस्वी यादव लगातार जीतते रहे हैं। 2020 में आरोप लगे थे कि चिराग ने यहां कैंडिडेट देकर तेजस्वी को फायदा पहुंचाया।
2020 का आंकड़ा और नई चुनौती : 2020 विधानसभा चुनाव में जदयू ने 115 और बीजेपी ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था। मांझी की पार्टी को 7 सीटें मिली थीं। उस समय एनडीए में चार दल थे। इस बार पांच दल हैं। इसलिए समझौता मुश्किल हो रहा है। चिराग पासवान राज्यसभा और विधान परिषद की सीटें भी चाहते हैं। उपेंद्र कुशवाहा भी परिषद में प्रतिनिधित्व चाहते हैं।
”हमारे बिहार प्रभारी और जमुई सांसद अरुण भारती जी ने कहा है कि हमारी पार्टी 43 से 137 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है। हमारा स्ट्राइक रेट 100 फीसदी का है। जब सर्वदलीय बैठक होगी तो वहां से लोजपा रामविलास को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। ऐसी हम उम्मीद करते हैं। हमने अपनी आकांक्षा को बीजेपी के सामने रख दिया है.”- विनीत सिंह, प्रवक्ता, लोजपा रामविलास
चर्चा में नीतीश-चिराग का पुराना विवाद : नीतीश कुमार और चिराग पासवान के बीच तल्खी किसी से छिपी नहीं है। हालांकि इस बार चिराग लगातार कह रहे हैं कि नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे। लोजपा का गठन 2003 में हुआ था। 2005 के फरवरी चुनाव में लोजपा ने 29 सीट जीती थीं, जो उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसके बाद पार्टी का ग्राफ गिरता गया। 2020 में अकेले चुनाव लड़ी और सिर्फ एक सीट मिली। अगर इस बार एनडीए के साथ चुनाव लड़ी तो यह पहला मौका होगा।
”चिराग पासवान दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. अरुण भारती न केवल सांसद हैं बल्कि पारिवारिक सदस्य भी हैं, कहीं ना कहीं चिराग की भाषा बोल रहे हैं. हालांकि इस बार 2020 वाली स्थिति नहीं है चिराग पासवान केंद्र में मंत्री हैं लेकिन सीटों का बंटवारा जल्द नहीं हुआ तो मुश्किलें जरूर बढ़ सकती है.”- राजनीतिक विश्लेषक
क्यों फंसा पेंच?: सीट बंटवारे में देरी की एक वजह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर फैसला लंबित होना भी बताई जा रही है। माना जा रहा है कि इस पर निर्णय होने के बाद सीट बंटवारे पर भी मुहर लगेगी। देखना होगा कि सितंबर में होने वाली सर्वदलीय बैठक में सब कुछ तय हो पाता है या नहीं!
ये भी पेंच फंसने की एक वजह: एनडीए में सीट बंटवारे का पेंच एक और वजह से फंस रहा है। एक तरफ जहां चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। तो वहीं कई ऐसे सीट हैं जिस पर कई की दावेदारी है। कई विधायक महागठबंधन से बागी होकर एनडीए का समर्थन किए थे। अब उनके सीट को लेकर भी पेंच फंस रहा है।
