- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना डेस्क। पटना से दिल्ली तक बीजेपी के संगठन में बिहार की धमक बढ़ी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने आखिरकार अपनी टीम का ऐलान कर दिया है और बिहार के खाते में तीन अहम जिम्मेदारियां आई हैं। सिद्धार्थ शंभू को राष्ट्रीय सचिव, राज्यसभा सांसद शिवेश कुमार राम को एससी मोर्चा का अध्यक्ष और ऋतुराज सिन्हा को प्रकोष्ठ संकुल का सह-संयोजक बनाया गया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि तीन नेताओं को पद मिला—असली सवाल यह है कि नितिन नबीन ने बिहार के इन तीन चेहरों पर दांव क्यों लगाया और इसके पीछे बीजेपी की अगली राजनीतिक रणनीति क्या है?
सिद्धार्थ शंभू: संगठन से राष्ट्रीय मंच तक छलांग
सिद्धार्थ शंभू की नियुक्ति को संगठन के भीतर उनकी लगातार सक्रियता के इनाम के तौर पर देखा जा रहा है। संजय जायसवाल के प्रदेश अध्यक्ष रहते वह प्रदेश मंत्री रहे और सम्राट चौधरी के कार्यकाल में प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। अब राष्ट्रीय सचिव बनाकर उन्हें सीधे राष्ट्रीय संगठन में जगह दी गई है।
यह नियुक्ति एक साफ संदेश भी देती है—बीजेपी में जमीनी संगठन से जुड़े युवा नेताओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रास्ता खुला हुआ है। शंभू के सामने अब चुनौती भी बड़ी है और अवसर भी। राष्ट्रीय सचिव की भूमिका में उन्हें सिर्फ बिहार नहीं, बल्कि पार्टी की व्यापक संगठनात्मक रणनीति को जमीन पर उतारने की परीक्षा देनी होगी।
शिवेश कुमार राम: दलित राजनीति में बीजेपी का बड़ा दांव
राज्यसभा सांसद शिवेश कुमार राम को बीजेपी एससी मोर्चा की कमान मिलना इस पूरी टीम की सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नियुक्तियों में से एक मानी जा सकती है। शिवेश कुमार राम पूर्व सांसद मुनीलाल राम के पुत्र हैं। उनके पिता सासाराम लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे। ऐसे राजनीतिक परिवार से आने वाले शिवेश के पास संगठन के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक आधार भी है।
एससी मोर्चे की जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने उन्हें सिर्फ संगठनात्मक पद नहीं दिया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर दलित समाज के बीच पार्टी की पहुंच और राजनीतिक संदेश को मजबूत करने का मिशन भी सौंपा है।यानी आने वाले समय में शिवेश कुमार राम की भूमिका बिहार से कहीं आगे दिखाई दे सकती है।
ऋतुराज सिन्हा: जिम्मेदारी बदली, कद नहीं!
ऋतुराज सिन्हा के मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनकी जिम्मेदारी बदली है, लेकिन संगठन में उनकी उपयोगिता बरकरार रखी गई है। जगत प्रकाश नड्डा की टीम में राष्ट्रीय सचिव रहे ऋतुराज सिन्हा को अब प्रकोष्ठ संकुल का सह-संयोजक बनाया गया है। संगठन में लंबे अनुभव और सक्रिय भूमिका के कारण पार्टी ने उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय टीम में बरकरार रखा है।
ऋतुराज सिन्हा पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा के पुत्र हैं और अब तक चुनावी राजनीति से दूर रहकर संगठनात्मक भूमिका में सक्रिय रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि बीजेपी फिलहाल उनके संगठनात्मक अनुभव को चुनावी राजनीति से ज्यादा प्राथमिकता दे रही है।
तीन नियुक्तियों में छिपा बड़ा राजनीतिक संदेश
नितिन नबीन की टीम में बिहार के इन तीन नेताओं की एंट्री को केवल पदों की घोषणा मानना राजनीतिक तौर पर अधूरा विश्लेषण होगा। तीनों नियुक्तियों में तीन अलग-अलग संदेश दिखाई देते हैं—
पहला—युवा और संगठन।
सिद्धार्थ शंभू के जरिए पार्टी ने संगठन में काम करने वाले नए नेतृत्व को राष्ट्रीय मंच दिया है।
दूसरा—दलित राजनीति।
शिवेश कुमार राम को एससी मोर्चे की जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने दलित सामाजिक आधार पर अपनी पकड़ और मजबूत करने का संकेत दिया है।
तीसरा—संगठनात्मक अनुभव।
ऋतुराज सिन्हा को राष्ट्रीय टीम में बनाए रखकर पार्टी ने अनुभवी संगठनात्मक चेहरों को भी महत्व दिया है।
नबीन की टीम में बिहार क्यों अहम?
नितिन नबीन खुद बिहार की राजनीति से आते हैं। ऐसे में उनकी राष्ट्रीय टीम में बिहार के तीन नेताओं को महत्वपूर्ण भूमिका मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा को जन्म देता है। लेकिन इसे केवल क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व मानना सही नहीं होगा।
बिहार बीजेपी के लिए राजनीतिक प्रयोगशाला भी है और राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण राज्य भी। ऐसे में बिहार के नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी देना पार्टी को राज्य की सामाजिक संरचना, संगठन और राजनीतिक जमीन से राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या नितिन नबीन की नई टीम आने वाले चुनावों में बीजेपी के संगठन को और आक्रामक बनाएगी? और क्या बिहार के ये तीन चेहरे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी नई जिम्मेदारियों के जरिए पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ तैयार कर पाएंगे? फिलहाल इतना साफ है—नितिन नबीन ने टीम घोषित की है, लेकिन बिहार को मिली तीन जिम्मेदारियों ने बीजेपी की आगे की रणनीति पर चर्चा जरूर तेज कर दी है।
