- डॉ अरुण कुमार मयंक –
नालंदा की धरती ने खो दी एक ऐसी साहसी समाजसेविका, जिसकी कहानी इतिहास के पन्नों में दर्ज होने का इंतजार करती रही। बबुरबन्ना की जेपी सेनानी, समाजसेविका और महिला जागरूकता की मजबूत आवाज लक्ष्मी देवी का 7 अगस्त 2026 को निधन हो गया। लंबे समय से उम्रजनित कमजोरी के कारण उनका इलाज पटना के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। निधन के समय वे काफी वृद्ध थीं। उनके जाने से परिवार ही नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों में भी शोक की लहर है।
1974 में जब पुलिस से छिपते थे जेपी सेनानी, लक्ष्मी देवी बनती थीं ढाल!
वर्ष 1974 की सम्पूर्ण क्रांति के दौर में जब जेपी आंदोलनकारी भूमिगत होकर संघर्ष कर रहे थे, तब लक्ष्मी देवी ने जोखिम की परवाह किए बिना उनका साथ दिया। स्थानीय एवं पारिवारिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने अपने घर और आश्रम में भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय दिया, भोजन कराया और जरूरी मदद पहुंचाई। इतना ही नहीं, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान में सहयोग करते हुए आंदोलनकारियों को पुलिस की निगरानी और गिरफ्तारी से बचाने में भी मदद की। उस दौर में किसी भूमिगत सेनानी को घर में पनाह देना मामूली बात नहीं थी। पुलिस की नजर पड़ने पर पूरे परिवार पर संकट आ सकता था। लेकिन लक्ष्मी देवी पीछे नहीं हटीं।
पति के संघर्ष को बनाया अपना संघर्ष:
4 सितंबर 1940 को नालंदा जिले के मकसूसपुर (चमर विगहा) में जन्मीं लक्ष्मी देवी शिक्षित और जागरूक महिला थीं। उनके पिता स्वर्गीय हरिहर सिंह कांग्रेस से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे। शिक्षा के महत्व को समझने वाले परिवार में पली-बढ़ीं लक्ष्मी देवी ने लारणपुर हाई स्कूल से मैट्रिक और नालंदा कॉलेज से इंटर की पढ़ाई की। 19 जुलाई 1961 को उनका विवाह बबुरबन्ना निवासी स्वर्गीय शिव नारायण प्रसाद से हुआ। पति के सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में वे केवल जीवनसंगिनी बनकर नहीं, बल्कि सहयोद्धा बनकर साथ खड़ी रहीं।
महिलाओं को जगाया, चरखा समिति को दी मजबूती:
लक्ष्मी देवी का संघर्ष सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था। महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता और आत्मनिर्भरता को वे सामाजिक बदलाव की कुंजी मानती थीं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, नालंदा में जेपी के मिशन से जुड़ी महिला चरखा समिति को सक्रिय करने और आगे बढ़ाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। वे महिलाओं को संगठित करने, उन्हें सामाजिक रूप से जागरूक बनाने और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम करती रहीं।
किसान और कमजोर तबके की आवाज भी बनीं:
बबुरबन्ना और आसपास के क्षेत्रों में किसान तथा सामाजिक संघर्षों में भी उनकी सक्रियता का उल्लेख मिलता है। सामाजिक असमानता, सामंती दबाव और वंचित वर्गों के अधिकार जैसे मुद्दों पर वे अपने पति के साथ मजबूती से खड़ी रहीं। उनका जीवन बताता है कि बदलाव केवल मंचों और सभाओं से नहीं आता—कभी-कभी घर की चौखट पर खड़ी एक साहसी महिला भी पूरे आंदोलन को ताकत दे देती है।
पति के निधन के बाद भी नहीं टूटीं:
14 अप्रैल 1977 को शिव नारायण प्रसाद के निधन के बाद लक्ष्मी देवी ने परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली। पांच बच्चों की परवरिश और शिक्षा के साथ उन्होंने समाजसेवा की भावना को भी जीवित रखा। उनके पुत्र शैलेन्द्र कुमार उर्फ पप्पू यादव कृषि कार्य से जुड़े हैं, जबकि छोटे पुत्र सतीश कुमार उर्फ पिक्कू यादव पूर्व मुखिया रह चुके हैं और वर्तमान में पैक्स अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
अंधविश्वास और पाखंड से रहीं कोसों दूर:
लक्ष्मी देवी की पहचान केवल जेपी आंदोलन की सहयोगी के रूप में नहीं थी। वे जीवनभर अंधविश्वास और पाखंड से दूर, जागरूक और तार्किक सोच रखने वाली महिला के रूप में रहीं। उनका मानना था कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब शिक्षा, जागरूकता और समानता को महत्व मिलेगा।
एक गुमनाम नायिका की विदाई:
लक्ष्मी देवी ने न पद मांगा, न प्रसिद्धि और न अपने संघर्षों का कोई व्यक्तिगत लाभ। उन्होंने परिवार, महिला जागरूकता, किसान हित, सामाजिक न्याय और जनसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। आज लक्ष्मी देवी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 1974 के उन कठिन दिनों में जेपी सेनानियों के लिए खोले गए उनके घर के दरवाजे, उनका साहस और उनका त्याग इतिहास की उन अनकही कहानियों में शामिल हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए।
बबुरबन्ना की यह साहसी महिला चली गईं, लेकिन सवाल छोड़ गईं—क्या ऐसे गुमनाम नायकों और नायिकाओं को इतिहास में वह सम्मान मिलेगा, जिसकी वे हकदार हैं?
