
- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना/ बिहारशरीफ डेस्क। जब इतिहास की धरती नालंदा की कलम बोलती है, तो उसकी आवाज सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहती—वह समाज की चेतना, शिक्षा की ताकत और बदलाव की उम्मीद बन जाती है। बिहार विधान परिषद के सभागार में रविवार देर शाम ऐसा ही साहित्यिक दृश्य देखने को मिला, जहां नालंदा के साहित्यकार एवं शिक्षाविद राकेश बिहारी शर्मा, साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह तथा साहित्यकार नवनीत कुमार को पंडित राजकुमार शुक्ल स्मृति सम्मान-2026 से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान महज प्रशस्ति-पत्र, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि नालंदा की साहित्यिक चेतना को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संदेश था। समारोह में हवेली खड़गपुर के साहित्यकार एवं कवि प्रदीप पाल तथा डॉ. मीनाक्षी कुमारी समेत कई साहित्यकारों को भी सम्मानित किया गया।
नालंदा की कलम को मिला सम्मान, साहित्य की ताकत का हुआ ऐलान:
समारोह का उद्घाटन मुख्य अतिथि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. एमडी सैयद अता हसनैन, रवीन्द्र शर्मा एवं आयोजकों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। राज्यपाल ने पंडित राजकुमार शुक्ल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि चंपारण के किसानों की समस्याओं, विशेषकर नील की खेती से जुड़ी तिनकठिया प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने और महात्मा गांधी को चंपारण लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके प्रयासों से गांधीजी चंपारण पहुंचे और वर्ष 1917 का चंपारण सत्याग्रह स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक अध्याय बना।
राज्यपाल ने इस बात पर जोर दिया कि राजकुमार शुक्ल जैसे महान व्यक्तित्वों की संघर्षगाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। बच्चों और युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन एवं राष्ट्र निर्माण से जुड़ी ऐसी कहानियों से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया और आधुनिक माध्यमों के उपयोग की जरूरत भी उन्होंने रेखांकित की। उन्होंने ‘लोकचिंतन’ पत्रिका में स्वतंत्रता आंदोलन के अनछुए पहलुओं और महान व्यक्तित्वों के योगदान पर अधिक सामग्री प्रकाशित करने का सुझाव दिया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राज्यपाल ने साहित्य को केवल किताबों तक सीमित विषय नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य समाज की चेतना, संवेदना और विचार-शक्ति का प्रतिबिंब है। साहित्यकार समाज के अनुभवों, संघर्षों और आकांक्षाओं को शब्द देता है। नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ना और युवाओं में अध्ययन, चिंतन तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति की प्रवृत्ति विकसित करना समय की बड़ी जरूरत है।
विधानसभा अध्यक्ष ने नालंदा की ज्ञान-परंपरा को किया याद:
बिहार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि बिहार की धरती सदियों से ज्ञान, शिक्षा, दर्शन और साहित्य की उर्वर भूमि रही है। नालंदा की ऐतिहासिक विरासत पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली ज्ञान और विचार की महान परंपरा की गवाही देती है। उनके वक्तव्य का सबसे बड़ा संदेश यही था कि नालंदा की पहचान सिर्फ खंडहरों, इतिहास और प्राचीन विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि आज की जीवंत बौद्धिक और साहित्यिक गतिविधियों से भी बननी चाहिए। पंडित राजकुमार शुक्ल के दृढ़ संकल्प और संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी स्मृति में साहित्यकारों और शिक्षाविदों का सम्मान उनके आदर्शों और सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
साहित्यकार समाज की अंतरात्मा—सुबोध कुमार सिंह
बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं साहित्यकार सुबोध कुमार सिंह ने साहित्यकार को समाज की अंतरात्मा की आवाज बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की विसंगतियों को सामने लाने के साथ सकारात्मक परिवर्तन का रास्ता भी दिखाता है। उन्होंने शिक्षा और साहित्य को केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम मानने से आगे बढ़कर उसमें मानवीय संवेदना, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के विकास को जरूरी बताया। सम्मानित साहित्यकारों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनके अब तक के साहित्यिक एवं शैक्षिक योगदान का अभिनंदन ही नहीं, बल्कि भविष्य में और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा भी है।
उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह ‘टाइगर’ का बड़ा संदेश:
समारोह के मुख्य वक्ता बिहार सरकार के उच्च शिक्षा एवं विधि विभाग के मंत्री संजय सिंह ‘टाइगर’ ने शिक्षा और ज्ञान की गुणवत्ता को राज्य के विकास का वास्तविक आधार बताया। उन्होंने उच्च शिक्षा को मजबूत करने के साथ साहित्य, शोध और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने को सरकार और समाज की साझा जिम्मेदारी बताया। उनके अनुसार साहित्य समाज को संवेदनशील बनाता है और साहित्यकार अपने समय की समस्याओं को शब्द देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए विचारों की विरासत छोड़ता है। उन्होंने कहा कि पंडित राजकुमार शुक्ल की स्मृति में आयोजित यह समारोह नई पीढ़ी को इतिहास, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रभावी माध्यम है। मंत्री ने यह भी कहा कि बिहार की पहचान केवल प्राचीन ज्ञान-परंपरा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि वर्तमान समय में शिक्षा, साहित्य और बौद्धिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान से भी बननी चाहिए। शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
सम्मान के बाद राकेश बिहारी शर्मा का साहित्यिक संकल्प:
सम्मान प्राप्त राकेश बिहारी शर्मा ने पंडित राजकुमार शुक्ल की स्मृति में मिले सम्मान को गौरवपूर्ण बताते हुए आयोजकों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मान साहित्यकारों को अधिक जिम्मेदारी और ऊर्जा के साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपनी रचनात्मक भूमिका निभाने की प्रेरणा देते हैं। उनका संदेश साहित्य की मूल भूमिका को रेखांकित करता है—साहित्यकार का काम केवल रचना करना नहीं, बल्कि अपने समय की सच्चाइयों को समझना, समाज की पीड़ा और आकांक्षाओं को स्वर देना तथा सकारात्मक बदलाव के लिए जनचेतना पैदा करना भी है। यही वह बिंदु है जहां नालंदा की साहित्यिक परंपरा वर्तमान सामाजिक सरोकारों से जुड़ती दिखाई देती है।
डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने बताया साहित्य की नई भूमिका:
साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। सामाजिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं, शिक्षा और जागरूकता को मजबूत करने में साहित्य की प्रभावी भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित राजकुमार शुक्ल स्मृति सम्मान-2026 जैसे आयोजन साहित्य के प्रति समाज में सम्मान बढ़ाने और नई पीढ़ी में रचनात्मक अभिरुचि विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। समारोह को पंडित राजकुमार शुक्ल स्मारक समिति के अध्यक्ष रवीन्द्र कुमार शर्मा एवं साहित्यसेवी धीरज कुमार ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर इंडियन रेड क्रॉस, बिहार शाखा के सदस्य अजीत कुमार सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षाविद एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
साहित्यिक विश्लेषण: सम्मान से आगे की कहानी है नालंदा की यह चमक:
इस पूरे आयोजन को केवल एक सम्मान समारोह मानना नालंदा की साहित्यिक चेतना को छोटा करके देखना होगा। असल कहानी यह है कि नालंदा एक बार फिर ज्ञान की अपनी पुरानी पहचान को आधुनिक साहित्यिक चेतना से जोड़ता दिखाई दे रहा है। जिस धरती ने दुनिया को नालंदा विश्वविद्यालय जैसी ज्ञान-परंपरा दी, उसी धरती से आज राकेश बिहारी शर्मा, डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और नवनीत कुमार जैसे साहित्यकार सम्मानित होकर यह संदेश दे रहे हैं कि ज्ञान की वह परंपरा इतिहास की किताबों में बंद नहीं हुई है। पंडित राजकुमार शुक्ल का जीवन भी इसी जीवंत चेतना का उदाहरण है। वे सत्ता के केंद्र में बैठे व्यक्ति नहीं थे, लेकिन किसानों की पीड़ा को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचाने का साहस रखते थे। उन्होंने सवाल उठाया, संघर्ष किया और महात्मा गांधी को चंपारण तक लाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
यही साहित्य की भी ताकत है—जो आवाज हाशिए पर है, उसे केंद्र तक पहुंचाना:
आज जब सूचना की बाढ़ है, लेकिन गहरे अध्ययन और चिंतन का समय सिकुड़ रहा है, तब साहित्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सोशल मीडिया की तेज दुनिया में साहित्य वह ठहराव दे सकता है, जहां समाज खुद से सवाल करता है। नालंदा के संदर्भ में यह जिम्मेदारी और भी बड़ी है। क्योंकि यहां साहित्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान की हजारों वर्ष पुरानी परंपरा का आधुनिक विस्तार है। इसलिए राकेश बिहारी शर्मा, डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और नवनीत कुमार का सम्मान व्यक्तिगत उपलब्धि भर नहीं माना जाना चाहिए। इसे नालंदा की उस साहित्यिक ऊर्जा के सम्मान के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जो इतिहास, शिक्षा, समाज और संवेदना को एक साथ जोड़ती है।
