
- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना स्टेट डेस्क। बिहार में कदाचार मुक्त परीक्षा की सख्ती अब कठघरे में है। मैट्रिक परीक्षा देने पहुंची एक छात्रा को महज़ 2 मिनट की देरी ने जिंदगी से दूर कर दिया। परीक्षा केंद्र का गेट बंद था। नियम सख्त थे। दरवाजा नहीं खुला। और कुछ ही घंटों बाद उसकी सांसें भी थम गईं।
साल भर की मेहनत… मिनटों में खत्म:
गांव से निकली थी सपनों के साथ। ट्रेन पकड़ी। फिर ऑटो लिया। रास्ते में ट्रैफिक ने रोका। बस 2 मिनट की देरी हुई। केंद्र पहुंची तो गेट बंद। अंदर कॉपी तक नहीं बंटी थी। लेकिन नियम पत्थर की लकीर साबित हुआ। एक साल की तैयारी। परिवार की उम्मीदें। भविष्य के सपने। सब कुछ दरवाजे पर रुक गया।
30 मिनट पहले बंद गेट… क्या जरूरी है इतनी सख्ती?:
बिहार में परीक्षा शुरू होने से आधा घंटा पहले ही गेट बंद कर दिया जाता है। एक मिनट भी लेट? तो एंट्री नहीं। राज्य के कई जिलों से ऐसी तस्वीरें आई हैं— बाहर रोते छात्र। गिड़गिड़ाते अभिभावक। गेट फांदने की कोशिश। और उन पर केस तक दर्ज।
सवाल उठ रहा है—
क्या परीक्षा अनुशासन का पाठ पढ़ा रही है?
या बच्चों को डर के साये में धकेल रही है?
एग्जाम का दबाव… बच्चों की टूटती हिम्मत:
परीक्षा का तनाव पहले ही भारी होता है। अच्छे अंक लाने का दबाव। परिवार की अपेक्षाएं। समाज की तुलना। ऐसे में 2 मिनट की देरी क्या जीवन से बड़ी हो गई? मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं—
बच्चे बेहद भावुक होते हैं।
असफलता का डर उन्हें अंदर से तोड़ देता है।
अगर संवेदना न मिले, तो वे गलत कदम उठा सकते हैं।
दूसरे बोर्ड में नहीं इतनी सख्ती:
अन्य बोर्ड परीक्षाओं में इतनी कठोर व्यवस्था कम देखने को मिलती है।
यहां 2 मिनट का मतलब—पूरा साल बर्बाद।
क्या नियमों में थोड़ी मानवीय गुंजाइश नहीं हो सकती?
क्या 5 मिनट की राहत से सिस्टम टूट जाएगा?
सप्लीमेंट्री का मौका… लेकिन डर बड़ा:
विशेषज्ञ कहते हैं—
एक परीक्षा पूरी जिंदगी नहीं होती।
सप्लीमेंट्री का अवसर भी मिलता है।
असफलता ही सफलता की सीढ़ी है।
लेकिन बच्चों के मन में बैठा डर
और समाज का दबाव
उन्हें सोचने का मौका नहीं देता।
जरूरत बदलाव की… अभी और यहीं:
अगर सख्ती जरूरी है,
तो सेंटर पास में क्यों नहीं?
अगर नियम जरूरी हैं,
तो विवेक की गुंजाइश क्यों नहीं?
जब बड़े कार्यक्रम घंटों लेट शुरू हो सकते हैं,
तो बच्चों के 2 मिनट पर इतनी बेरहमी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल:
क्या अनुशासन के नाम पर संवेदनाएं कुचल दी जाएं?
क्या 2 मिनट की देरी जिंदगी से बड़ी है?
क्या एक बंद गेट मौत का कारण बनना चाहिए?
अब फैसला सिस्टम को करना है—
नियम पहले या इंसान?
सख्ती पहले या संवेदना?
क्योंकि परीक्षा हर साल आएगी…
लेकिन एक जिंदगी वापस नहीं आएगी।
