

- डॉ अरुण कुमार मयंक –
बिहारशरीफ डेस्क। शौर्य, साहस और बलिदान के प्रतीक सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज का 359वां प्रकाश उत्सव बिहारशरीफ के भरावपर स्थित श्री गुरु नानक संगत पैजाबा गुरुद्वारा में पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही गुरुद्वारा परिसर गुरुवाणी, शब्द कीर्तन और अरदास से गूंजता रहा। संगत ने मत्था टेक गुरु चरणों में शीश नवाया।
पटना से आए रागी जत्थों ने गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन, उनके अद्वितीय बलिदान और चार साहिबज़ादों की शहादत से जुड़े शब्दों का भावपूर्ण गायन किया। हर शब्द में जोश था। हर सुर में आस्था। श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। पूरा परिसर “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” के जयकारों से गूंज उठा।
इस अवसर पर बिहार सिख फेडरेशन पटना साहिब के संस्थापक सरदार भाई त्रिलोक सिंह निषाद ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब में हुआ था। वे एक महान आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ अद्वितीय योद्धा, कवि और दार्शनिक भी थे। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना कर सिख समाज को नई पहचान दी तथा गुरु ग्रंथ साहिब को 11वां गुरु घोषित किया। मुख्य कथा वाचक ज्ञानी दलजीत सिंह ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी का संदेश मानवता, प्रेम और सत्य पर आधारित था। उनका मानना था कि इंसान से प्रेम करना ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है और बुराई के खिलाफ खड़े रहना ही सच्चा धर्म है।
बिहार सिख फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष सरदार दिलीप सिंह पटेल ने कहा कि 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना कर गुरु जी ने समाज को साहस और आत्मसम्मान की नई दिशा दी। मीडिया प्रभारी राकेश बिहारी शर्मा ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को पंज ककार प्रदान किए और पुरुषों को “सिंह” तथा महिलाओं को “कौर” की उपाधि दी। ग्रंथी सतनाम सिंह उर्फ अनिल सिंह ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने कमज़ोरों को वीर और बहादुरों को सिंह बनाया। उनका नाम आज भी साहस और शौर्य का प्रतीक है।
सरदार भाई वीर सिंह ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने देश और धर्म की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया। उनके दो पुत्रों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया, फिर भी गुरु जी अपने धर्म और कर्तव्य से कभी विचलित नहीं हुए। समाजसेवी धीरज कुमार ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महानतम व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे महान लेखक, कवि, दार्शनिक, रणनीतिकार और अप्रतिम योद्धा थे।
कार्यक्रम में जिला एवं सत्र न्यायाधीश गुरुविंदर सिंह मल्होत्रा अपने परिवार सहित उपस्थित रहे। सरदार अनिल सिंह, सरदार दीप सिंह, रघुवंश सिंह, धर्मवीर सिंह, अरुण बिहारी शरण, सुमित बिहारी, अमर सिंह, श्रीकांत, युवराज सिंह, सुनीता कौर, सुरेन्द्र प्रसाद, कुंदन कुमार, सरदार, भवदेव प्रसाद, अनिल सिंह, सरदार दीप सिंह, रघुवंश सिंह, धर्मवीर सिंह,विजय पासवान, दिनेश चौधरी, भाई रवि सिंह ग्रंथी रोहित कुमार, दीपक कुमार,राजदेव पासवान ने मत्था टेका। साथ ही अन्य न्यायाधीश राजेश गौरव, योगेन्द्र कुमार शुक्ला, अभय सिंह, समाजसेवी, सिख संगठनों के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरु दरबार में मत्था टेका। कार्यक्रम के पश्चात विशाल गुरु का लंगर आयोजित किया गया। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर लंगर ग्रहण किया। सेवा, समानता और भाईचारे का संदेश स्पष्ट रूप से देखने को मिला।
समाप्ति संदेश:
गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन साहस, बलिदान और मानवता की अमर प्रेरणा है!
