- डॉ अरुण कुमार मयंक –
बिहारशरीफ डेस्क। नालंदा की राजनीति में इन दिनों महागठबंधन की ट्यून बिगड़ती दिख रही है। एक मंच पर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव का साथ दिखने की बात खूब उछली, पर हुआ उल्टा- राहुल आए, तेजस्वी गायब रहे। प्रचार सिर्फ भीड़ जुटाने के लिए किया गया था।
🔹 नालंदा में कांग्रेस अकेली पड़ती नजर आई:
पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नालंदा जिले में कांग्रेस प्रत्याशियों के समर्थन में एक भी सभा नहीं की। जबकि अस्थावां, इस्लामपुर और हिलसा में उन्होंने राजद उम्मीदवारों के पक्ष में जोरदार प्रचार किया। लोग पूछ रहे हैं- क्या महागठबंधन में सब ठीक नहीं है?
🔹 नूरसराय में राहुल की सभा, तेजस्वी के बिना फीकी पड़ी रैली:
राहुल गांधी ने 30 अक्टूबर को नालंदा के नूरसराय में सरदार पटेल स्टेडियम में सभा की। कार्यक्रम से पहले सोशल मीडिया पर तेजस्वी के आने का खूब प्रचार हुआ। पर मंच पर जब राहुल अकेले पहुंचे, भीड़ की उम्मीदें टूट गईं। पहले गूंज रहे नारे धीरे-धीरे थम गए, तालियां कम बजीं और भीड़ सरकने लगी।
राहुल खूब गरजे, पर भीड़ का जोश कम गया।
🔹 रहुई की सभा में भी तेजस्वी की गैरमौजूदगी:
बिहारशरीफ विस के रहुई बाजार में 3 नवंबर को तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी की साझा रैली का जोरदार प्रचार हुआ। सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया में खबरें आईं, पर तेजस्वी फिर गायब रहे।
केवल मुकेश सहनी पहुंचे, सभा की और चले गए।
इस पर राजद कार्यालय ने सफाई दी : “तेजस्वी यादव के आने का कोई कार्यक्रम था ही नहीं।
🔹 कांग्रेस प्रत्याशियों को झटका:
नालंदा जिले की तीन सीटों — बिहारशरीफ, नालंदा और हरनौत — पर कांग्रेस उम्मीदवार मैदान में हैं। बिहारशरीफ से उमैर खान, जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं। राहुल की बिहारशरीफ में गैर-मौजूदगी से निराश हुए समर्थक।
🔹 अंदरखाने की दरारें उजागर?:
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं- “राहुल-तेजस्वी की जुदा रैलियां और कांग्रेस प्रत्याशियों के कार्यक्रमों से दूरी, यह संकेत है कि महागठबंधन के भीतर सबकुछ सहज नहीं।”
अब नालंदा के सियासी गलियारों में चर्चा तेज —
“क्या कांग्रेस और राजद के बीच भरोसा डगमगा गया है?”
🔹 वोटरों में बढ़ी उलझन:
तेजस्वी यादव के नहीं आने से राजद समर्थक मतदाता कन्फ्यूजन में हैं। कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए यह चुनावी समीकरण बदल सकता है।
🔥निष्कर्ष:
नालंदा में महागठबंधन की “एकता” अब सवालों के घेरे में है।
राहुल आए, तेजस्वी नहीं।
भीड़ निराश, मंच सन्न।
और अब सियासी गलियारों में गूंज —
“महागठबंधन में सब ठीक नहीं चल रहा!”
