
पटना। डॉ अरुण कुमार मयंक-
बिहार में इस वक्त दो महापर्व एक साथ चल रहे हैं।
एक तरफ लोकतंत्र का उत्सव- विधानसभा चुनाव,
और दूसरी तरफ लोक आस्था का महापर्व- छठ।
लेकिन इस बार दोनों के रंग ऐसे घुले हैं कि भक्ति भी अब सियासत से अछूती नहीं रही।
छठ घाटों पर सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं, नेता भी पूरे जोश में हैं।
कोई घाट की सफाई करा रहा है,
कोई प्रसाद वितरण में जुटा है,
तो कोई कैमरे के सामने ‘सेवा’ के नाम पर वोट साधने की कोशिश कर रहा है।
हर घाट पर पोस्टर, बैनर और नेताओं के संदेशों की होड़ लगी है।
कहीं “नेता जी का सहयोग” लिखा है,
तो कहीं “फलां पार्टी की ओर से व्रतियों को शुभकामनाएं।”
आस्था के बीच राजनीतिक प्रचार की खुशबू अब साफ महसूस की जा सकती है।
लोगों का कहना है-
“पहले घाट पर सूर्य देव की आराधना होती थी,
अब पहले नेता जी की आरती उतारनी पड़ती है।”
सियासत अब हर त्योहार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना जानती है।
जहाँ पहले नेता घर-घर घूमकर वोट मांगते थे,
अब वो घाट-घाट जाकर ‘श्रद्धा’ के बहाने ‘सहयोग’ जुटा रहे हैं।
नेताओं के लिए छठ सिर्फ श्रद्धा नहीं,
बल्कि ‘जनता से जुड़ने का सुनहरा मौका’ बन गया है।
कई जगह नेताओं ने घाटों पर सेल्फी जोन तक बनवा दिए हैं।
व्रतियों से लेकर आम जनता तक- हर कोई देख रहा है कि
कौन कितना धार्मिक और कितना राजनीतिक है।
सोशल मीडिया पर भी माहौल गरम है।
नेताओं की तस्वीरें और वीडियो- ‘छठ घाट निरीक्षण’, ‘सुरक्षा समीक्षा’,
और ‘व्रतधारियों की सेवा’ जैसे टैगलाइन के साथ वायरल हो रही हैं।
लेकिन जनता सब समझ रही है।
एक व्रती ने मुस्कुराते हुए कहा—
“भक्ति में भी अब वोट का बटन दबने लगा है।”
छठ घाटों की भीड़ में
राजनीति की परछाई साफ झलक रही है।
कहीं सूर्य देव को अर्घ्य दिया जा रहा है,
तो कहीं नेता अपनी छवि चमकाने में जुटे हैं।
आस्था का पर्व, चुनाव का मौसम-
दोनों में भावनाओं की लहरें एक साथ बह रही हैं।
बस फर्क इतना है कि
सूर्य देव अर्घ्य लेते हैं श्रद्धा से,
और नेता वोट लेते हैं अवसर से। 🌅🗳️
