
- डॉ अरुण कुमार मयंक –
पटना डेस्क। पटना की सत्ता गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है—क्या नीतीश कुमार अब वही रास्ता पकड़ चुके हैं, जिस पर चलने के लिए वे वर्षों तक लालू परिवार को कोसते रहे?
जिस नेता ने खुद को “परिवारवाद विरोधी राजनीति” का सबसे बड़ा चेहरा बताया, उसी नेता के बेटे निशांत कुमार अब सीधे बिहार सरकार में मंत्री बन गए हैं। 8 मार्च को जदयू दफ्तर में औपचारिक राजनीतिक एंट्री…और महज दो महीने बाद कैबिनेट में जगह! राजनीतिक गलियारों में इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि “सत्ता की विरासत का सुपरफास्ट ट्रांसफर” कहा जा रहा है।
नीतीश का सबसे बड़ा यू-टर्न? जिस परिवारवाद पर लालू को घेरा, उसी पर अब खुद घिर गए!
नीतीश कुमार वर्षों तक एक लाइन बार-बार दोहराते रहे— “कर्पूरी ठाकुर ने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया, हमने भी परिवार को राजनीति से दूर रखा।” यही उनकी राजनीतिक ब्रांडिंग थी। यही उनकी नैतिक ताकत थी। यही RJD पर सबसे बड़ा हमला था। लेकिन अब सवाल उठ रहा है— अगर राजनीति में परिवार की एंट्री गलत थी, तो निशांत कुमार को सीधे मंत्री बनाना सही कैसे हो गया? विपक्ष इसे “नीतीश मॉडल का पतन” बता रहा है।
CM की कुर्सी छोड़ी…लेकिन सत्ता पर पकड़ नहीं! क्या पर्दे के पीछे से नई राजनीतिक विरासत तैयार कर रहे हैं नीतीश?
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति में यह चर्चा तेज थी कि असली शक्ति अभी भी नीतीश कुमार के हाथ में ही है। अब निशांत कुमार की कैबिनेट में एंट्री ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ मंत्री पद नहीं, बल्कि “उत्तराधिकारी प्रोजेक्ट” की शुरुआत है।
यानि—
आज मंत्री…
कल उपमुख्यमंत्री…
और भविष्य में मुख्यमंत्री चेहरा?
यही वजह है कि विपक्ष अब खुलकर कह रहा है कि जदयू भी आखिरकार “वंशवादी राजनीति” के उसी दलदल में उतर चुकी है, जिसके खिलाफ वह खुद को अलग बताती थी।
जदयू की सफाई: “ये परिवारवाद नहीं, कार्यकर्ताओं की मांग है”
परिवारवाद के आरोपों पर जदयू बचाव में उतर आई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि निशांत कुमार को राजनीति में लाने का फैसला नीतीश कुमार का निजी एजेंडा नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और जनता की इच्छा थी। जदयू नेता निहोरा यादव ने RJD पर पलटवार करते हुए कहा—“तेजस्वी यादव को लालू यादव ने विरासत सौंपकर लॉन्च किया था, जबकि निशांत कुमार को कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़ाया है।” लेकिन राजनीतिक सवाल वहीं खड़ा है—अगर कार्यकर्ताओं की मांग ही पैमाना है, तो क्या अब हर बड़े नेता का बेटा मंत्री बन जाएगा?
“चाहते तो डिप्टी CM बन जाते…” जदयू नेताओं ने साधा भावनात्मक दांव
जदयू विधायक और नेताओं ने निशांत कुमार की “सादगी” को बड़ा मुद्दा बनाया है। कहा जा रहा है कि वे चाहते तो सीधे उपमुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने “सिर्फ मंत्री पद” स्वीकार कर विनम्रता दिखाई। लेकिन विपक्ष इस तर्क को “राजनीतिक पैकेजिंग” बता रहा है। कांग्रेस और RJD नेताओं का कहना है कि असली मुद्दा पद छोटा या बड़ा नहीं, बल्कि बिना राजनीतिक संघर्ष के सत्ता में सीधी एंट्री है।
तेजस्वी यादव का तंज: “अब परिवारवाद पर बोलने का नैतिक अधिकार खत्म”
निशांत कुमार के मंत्री बनते ही तेजस्वी यादव ने जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा—“जो लोग सालों तक हमें परिवारवाद का पाठ पढ़ाते रहे, अब वे खुद अपने बेटे को सीधे मंत्री बना रहे हैं।” RJD का दावा है कि तेजस्वी यादव चुनाव जीतकर, विपक्ष झेलकर और राजनीतिक संघर्ष के बाद मंत्री बने थे, जबकि निशांत कुमार को सीधे सत्ता का टिकट दे दिया गया।
20 साल तक परिवार को राजनीति से दूर रखा…फिर अचानक ऐसा क्या बदल गया?
यही सवाल अब बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा रहस्य बन गया है। दो दशक तक नीतीश कुमार ने न सिर्फ अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा, बल्कि पार्टी नेताओं के रिश्तेदारों को भी ज्यादा बढ़ावा नहीं दिया। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि निशांत कुमार को इतनी तेजी से लॉन्च करना पड़ा?
राजनीतिक गलियारों में कई चर्चाएं हैं—
क्या नीतीश को अपनी राजनीतिक विरासत सुरक्षित करनी थी?
क्या जदयू को भविष्य का चेहरा चाहिए?
क्या पार्टी में नेतृत्व संकट गहरा रहा है?
या फिर NDA की नई सत्ता संरचना में अपना प्रभाव बनाए रखने की रणनीति है?
क्या जदयू अब “वन मैन पार्टी” से “फैमिली पार्टी” बनने की राह पर है?
निशांत कुमार की एंट्री ने जदयू की मूल राजनीतिक पहचान पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। जिस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत “सिद्धांत आधारित राजनीति” मानी जाती थी, अब वही पार्टी विपक्ष के लिए सबसे आसान निशाना बन गई है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर आगे भी निशांत कुमार को तेजी से प्रमोट किया गया, तो जदयू और RJD के बीच “परिवारवाद” का फर्क लगभग खत्म हो जाएगा।
निशांत कुमार का पहला बयान: “ईमानदारी से जिम्मेदारी निभाऊंगा”
मंत्री पद की शपथ लेने के बाद निशांत कुमार ने कहा—
“जो जिम्मेदारी मिली है, उसे पूरी ईमानदारी से निभाऊंगा।”
इसके बाद जदयू कार्यालय में उनका भव्य स्वागत हुआ।
कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए, मिठाइयां बांटीं और कई नेताओं ने उन्हें “भविष्य का चेहरा” तक बता दिया। अंदरखाने मायूसी भी! कई कार्यकर्ता बोले—‘सिर्फ मंत्री क्यों, डिप्टी CM बनाना चाहिए था।’ जदयू के भीतर उत्साह के साथ-साथ एक वर्ग में हल्की नाराजगी भी देखी जा रही है। कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर निशांत कुमार को लॉन्च ही करना था, तो उन्हें सीधे उपमुख्यमंत्री बनाना चाहिए था।
यानी साफ है—
जदयू के भीतर अब “निशांत युग” की चर्चा खुलकर शुरू हो चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या अब नीतीश और लालू की राजनीति में फर्क बचा है?
बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम सिर्फ एक मंत्री पद का मामला नहीं है।
यह उस राजनीतिक नैरेटिव का टूटना है, जिसे नीतीश कुमार ने वर्षों तक अपने सबसे बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
अब जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या परिवारवाद सिर्फ दूसरों के लिए गलत था?
और क्या सत्ता की राजनीति आखिरकार हर नेता को उसी मोड़ पर ले आती है, जिसका वह कभी विरोध करता है? बिहार की राजनीति में यह बहस अभी लंबी चलने वाली है…और 2030 के चुनाव तक यह मुद्दा NDA बनाम विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन सकता है।
