खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते युद्ध के असर की तपिश अब बिहार की रसोई तक महसूस होने लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस आपूर्ति और कीमतों को लेकर पैदा हुई हलचल के बीच राज्य के कई इलाकों में LPG सिलेंडर की किल्लत गहराती जा रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कालाबाजारी चरम पर है और आम उपभोक्ताओं को समय पर गैस नहीं मिल पा रही। मजबूरन गांवों की महिलाएं फिर से उपले और लकड़ियों के धुएं में खाना बनाने को विवश हैं, जिससे न सिर्फ उनकी सेहत पर असर पड़ रहा है बल्कि उज्ज्वला जैसी योजनाओं की हकीकत भी सवालों के घेरे में आ गई है।
- पंचमुखी एक्सक्लूसिव –
पटना स्टेट ब्यूरो। रसोई गैस की बढ़ती कीमत और समय पर सिलेंडर नहीं मिलने की समस्या ने शिवहर के ग्रामीण इलाकों में हालात बदल दिए हैं। महंगी गैस से परेशान परिवार अब फिर से पुराने चूल्हे की आग जलाने को मजबूर हैं। गोबर के उपले और सूखी लकड़ियां ही अब कई घरों की रसोई का सहारा बन गई हैं।
महंगाई से टूटा घरेलू बजट:
धर्मपुर वार्ड-12 की मीरा देवी बताती हैं कि खेती पर निर्भर परिवार के लिए महंगाई में घर चलाना मुश्किल हो गया है। उनके पति रामश्रीष्ठ ठाकुर किसान हैं और तीन बेटों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी भी इसी आमदनी से चलती है। ऐसे में गैस सिलेंडर भरवाना अब जेब पर भारी पड़ रहा है।
‘2500 रुपये तक पड़ रहा सिलेंडर’:
मीरा देवी कहती हैं कि गैस सिलेंडर अब करीब 2 से 2.5 हजार रुपये तक पड़ रहा है। मजबूरी में उन्हें फिर से गोबर के उपले और चिपरी बनाकर चूल्हा जलाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि पति दो दिन से गैस एजेंसी के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सिलेंडर नहीं मिल रहा।
सुबह-सुबह बनते हैं उपले:
मीरा देवी बताती हैं कि घर की जिम्मेदारियों और बच्चों की पढ़ाई के बीच सुबह-सुबह गोबर के उपले बनाकर सुखाने पड़ते हैं ताकि समय पर खाना बन सके। हालात ऐसे हो गए हैं कि जरूरत पड़ी तो इन्हीं उपलों को बेचकर परिवार का पेट पालना पड़ेगा।
किसान परिवारों पर बढ़ा बोझ:
गांव की ही हंसा देवी बताती हैं कि उनके पति शिवनाथ सहनी किसान हैं और दो बेटे पढ़ाई कर रहे हैं। सीमित आमदनी में परिवार चलाना पहले ही मुश्किल था, अब गैस की बढ़ती कीमतों ने परेशानी और बढ़ा दी है।
‘उपला बनाना मजबूरी बन गया’:
हंसा देवी कहती हैं कि गैस इतनी महंगी हो गई है कि मजबूरी में फिर से गोबर के उपले पाथने पड़ रहे हैं। उनका कहना है कि पहले की तरह सस्ती कीमत पर गैस मिले तो गरीब परिवारों को राहत मिल सकती है।
आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया:
सावित्री देवी कहती हैं कि पहले और अब के समय में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया हो गया है।
महिलाओं की सरकार से अपील:
ग्रामीण महिलाओं ने सरकार से गैस सिलेंडर के दाम कम करने और गांवों में इसकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा तो गांवों में चूल्हा-उपलों का दौर स्थायी रूप से लौट सकता है।
